Friday, November 9, 2012

किसी कवि की कल्पना, रूप का श्रृंगार हो


किसी कवि की कल्पना, रूप का श्रृंगार हो,
इस जमीं पे सौंदर्य का एक मात्र प्रमाण हो,
प्रेम का मैं पथिक भटक रहा था दर-बदर,
इस पथिक के प्रेम की आखिरी तलाश हो,
सात रंग, सात सुर, इन्द्रधनुष में सात हैं,
पर श्रृंगार सौंदर्य का एक तुम वास हो,
भौरे का भमर फूलो का पराग हो,
मेरे दिल बजने वाली एक मात्र साज हो,
किसी कवि की कल्पना, रूप का श्रृंगार हो,
इस जमीं पे सौंदर्य का एक मात्र प्रमाण हो ||

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