हिन्दू बनना मुस्लिम बनना
ये तो राह आसानी की,
एक रंग में जाये सब
बनना हिन्दुस्तानी है|
धर्म का दिन , मजहब की रातें
ये तो बात बेईमानी की,
एक समय जब मिल बैठ हम
ऐसी ईद दीवाली हो |
हिन्दू बनना मुस्लिम बनना
ये तो राह आसानी की,
तुमने लुटा हमने लुटा
दोनों ही सौदाई है
अब ना आंसूं बहे जहाँ में
वो माहौल बनानी है|
हिन्दू बनना मुस्लिम बनना
ये तो राह आसानी की,
एक रंग में जाये सब
बनना हिन्दुस्तानी है|
Thursday, October 28, 2010
Wednesday, October 27, 2010
मैंने सोचा ना था
वक्त युहीं गुज़र जायेगा, मैंने सोचा ना था
अरमान ख्वाब रह जायेगे, मैंने सोचा ना था
मैंने रात बहाए थे आसूं उसकी तंगदिली पर
वो यूँही फेर लेगा नज़रे, मेरे मुफलिसी में
ये उसकी जात (जन्म से) में हैं शामिल, मैंने सोचा ना था ||
अरमान ख्वाब रह जायेगे, मैंने सोचा ना था
मैंने रात बहाए थे आसूं उसकी तंगदिली पर
वो यूँही फेर लेगा नज़रे, मेरे मुफलिसी में
ये उसकी जात (जन्म से) में हैं शामिल, मैंने सोचा ना था ||
Friday, September 17, 2010
बिना उनके मैं अधुरा
बिना उनके मैं अधुरा हूँ...
जैसे
सीता बिन राम...
राधे बिन श्याम...
पार्वती बिन शिव...
वैसे
माया बिन रघु...
जैसे
सीता बिन राम...
राधे बिन श्याम...
पार्वती बिन शिव...
वैसे
माया बिन रघु...
Monday, September 13, 2010
जिंदगी का सफ़र
जब निकल सफ़र पे हम,
जिंदगी के साथ हो लिए,
रख दिल में हौसले,
जिंदगी के हर रंग को जी लिए,
जिंदगी ने क्यों न साथ दिया,
जब कुछ रंग अपने मन से चुन लिए ||
जिंदगी के साथ हो लिए,
रख दिल में हौसले,
जिंदगी के हर रंग को जी लिए,
जिंदगी ने क्यों न साथ दिया,
जब कुछ रंग अपने मन से चुन लिए ||
Friday, August 27, 2010
जिंदगी
अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी,
रिश्ते सभी खो गए और
चलती रही ये जिंदगी,
बचपन तो जैसे खो गया
तेरे मेरे के खेल में और
हमसे युहीं खेलती रही ये जिंदगी,
अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी,
आँगन में खड़े दीवारों और
दिल के बंद दरवाजो से
हम पे हंसती रही ये जिंदगी
अंतिम पड़ाव जब आया
अपनों की याद आयी
आया नंज़र न कोई हमें तब
हम समझ गए ये जिंदगी,
अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी ||
Thursday, August 26, 2010
मेरे रचनाये
1. कैसे बेवफ़ा कह दू, तू मेरी जाने-जाना है
खता मुझसे हुई होगी, जो तुने ये सजा दी है|
2. जिंदगी बेजार सी लगती हैं, कभी हेरा तो कभी परेशां सी लगती हैं,
तेरी एक नज़र पड़ जाये अगर ऐ दिलनशीं, वीरानियों में भी बहार आ जाये|
3. अपनों के गम से परे जिंदगी क्या होगी,
अपना प्यार पा सके जिंदगी इससे बुरी क्या होगी,
हमने जो सोचा लिखे जिंदगी के कुछ नए पन्ने,
अतीत दरवाजे पे कड़ी हो तो नयी बात क्या होगी|
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