अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी,
रिश्ते सभी खो गए और
चलती रही ये जिंदगी,
बचपन तो जैसे खो गया
तेरे मेरे के खेल में और
हमसे युहीं खेलती रही ये जिंदगी,
अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी,
आँगन में खड़े दीवारों और
दिल के बंद दरवाजो से
हम पे हंसती रही ये जिंदगी
अंतिम पड़ाव जब आया
अपनों की याद आयी
आया नंज़र न कोई हमें तब
हम समझ गए ये जिंदगी,
अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी ||