Friday, August 27, 2010

जिंदगी

अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी,
रिश्ते सभी खो गए और
चलती रही ये जिंदगी,
बचपन तो जैसे खो गया
तेरे मेरे के खेल में और
हमसे युहीं खेलती रही ये जिंदगी,
अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी,
आँगन में खड़े दीवारों और
दिल के बंद दरवाजो से
हम पे हंसती रही ये जिंदगी
अंतिम पड़ाव जब आया
अपनों की याद आयी
आया नंज़र न कोई हमें तब
हम समझ गए ये जिंदगी,
अपने परायों के शब्द में
पीसती रही ये जिंदगी ||

Thursday, August 26, 2010

मेरे रचनाये

1. कैसे बेवफ़ा कह दू, तू मेरी जाने-जाना है
खता मुझसे हुई होगी, जो तुने ये सजा दी है|

2. जिंदगी बेजार सी लगती हैं, कभी हेरा तो कभी परेशां सी लगती हैं,
तेरी एक नज़र पड़ जाये अगर ऐ दिलनशीं, वीरानियों में भी बहार आ जाये|

3. अपनों के गम से परे जिंदगी क्या होगी,
अपना प्यार पा सके जिंदगी इससे बुरी क्या होगी,
हमने जो सोचा लिखे जिंदगी के कुछ नए पन्ने,
अतीत दरवाजे पे कड़ी हो तो नयी बात क्या होगी|